शरीर में कफ का निर्माण उस समय आरंभ होता है जब पंचमहाभूतों में जल और पृथ्वी का अनुपात बढ़ने लगता है। भोजन, वातावरण, दिनचर्या और मनोविकार, ये चारों मिलकर शरीर की धातुओं को प्रभावित करते हैं, और जब पाचनाग्नि मंद होने लगती है, तब बिना जले अन्नरस से कफ का बीज बनता है। यही बीज आगे चलकर कफ-दोष को व्यापक रूप देता है। मधुर, अम्ल और लवण रसों की अधिकता, दिन में सोने की आदत, भारी और तैलीय भोजन, ठंडे पदार्थों का अधिक सेवन तथा आलस्य से युक्त जीवन,ये सभी कफ को जन्म देते और बढ़ाते हैं।

 

✍️रात्रि के समय शरीर स्वाभाविक रूप से शीतल होता है, ऐसे में यदि देर से पचा भोजन पेट में रुका रह जाए तो वह स्निग्धता से भरकर कफ-जैसा घनिष्ठ रूप ले लेता है। सुबह उठते ही गले में जमा चिकनाहट, नाक में जमे हुए म्यूकस का भार, सिर में हल्की-सी भारीपन की अनुभूति, ये संकेत बताते हैं कि कफ भीतर आकार ले चुका है। कफ का स्वभाव गुरु, मंद, शीत, स्निग्ध, श्लेष्म और स्थिर है; जब इन गुणों की बढ़ोतरी होती है तो शरीर पहले सुस्त, फिर भारी, और अंत में अवरोध से भरा प्रतीत होने लगता है।

 

✍️कफ का निर्माण केवल भोजन से नहीं होता, बल्कि मन की भावनाएँ भी इसे बढ़ाती हैं। अधिक मोह, अत्यधिक संग्रह, आलस्य, अवसाद और असंयम,ये मनोभाव जल और पृथ्वी तत्व को बढ़ाकर कफ-दोष को उत्तेजित करते हैं। ऐसे व्यक्ति अक्सर देर से उठते हैं, हलचल कम करते हैं, और उनका चेहरा प्रायः तैलयुक्त या चमकदार दिखाई देता है। शरीर में ठंडापन बढ़ने से कफ गाढ़ा होकर नलिकाओं में रुकावट पैदा करता है, जिससे श्वास में भारीपन, छाती में जकड़न, बार-बार सर्दी-जुकाम, बलगम के धागे, अपच और भूख का कम होना दिखाई देता है।

 

✍️जब जठराग्नि मंद हो जाती है, तब आहार रस ठीक से नहीं पकता। कफ इसी अपक्व अन्नरस का परिणाम है। भारी भोजन- जैसे, चावल, दही, दूध, मैदा, शक्कर, रबड़ी, तला और तैलीय पदार्थ — शरीर की प्रक्रिया को और धीमा कर देते हैं। धीमे पाचन की स्थिति में शरीर सबको संग्रह करके रखने लगता है, जिससे कफ का क्षेत्र और फैलता चला जाता है। बैठे-बैठे रहना, कम चलना, योग-व्यायाम न करना, देर रात तक जागना और सुबह अधिक सोना कफ की प्राकृतिक प्रवृत्ति को और प्रबल बनाते हैं।

 

✍️कफ की वृद्धि का दूसरा चरण है शरीर में स्थिरता का जमाव। यह जमाव नाक, गला और फेफड़ों में दिखाई देता है। कफ जब तरल से गाढ़ा होकर बैठने लगे तो प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है, जिससे संक्रमण जल्दी होने लगता है। शरीर भारी, मन सुस्त, विचार धीमे, और ऊर्जा कम प्रतीत होती है। कफ व्यक्ति को स्थिर, शांत और स्थायित्व प्रदान करता है, परंतु इसकी अधिकता जड़ता बन जाती है।

 

✍️कफ की वृद्धि का तीसरा चरण है अवरोध। यह अवरोध साइनस तक पहुँच जाए तो सिरदर्द, कान बंद होना, नाक का सुबह-सुबह न खुलना, बार-बार गले में खराश और बलगम की लहरें महसूस होना सामान्य हो जाता है। पेट में कफ बढ़ने पर भूख समाप्त हो जाती है या भूख लगती भी है पर भोजन पचता नहीं। कफ रस-धातु में गाढ़ापन लाता है जिससे त्वचा और बाल तैलीय दिखाई देते हैं।

 

✍️प्राकृतिक रूप से शरीर सुबह 6 से 10 बजे और शाम 6 से 10 बजे कफ-काल में होता है। इस समय भारीपन बढ़ सकता है, इसलिए इस अवधि में ठंडे और भारी पदार्थ लेने से कफ तेजी से बनता है। भोजन का समय, उसकी गुणवत्ता और मात्रा — तीनों कफ के निर्माण को प्रभावित करते हैं।

 

कफ बनने की प्रक्रिया को उलटने का मार्ग अग्नि को प्रज्वलित करना है। यदि पाचनाग्नि प्रबल हो जाए तो कफ स्वाभाविक रूप से गलकर निकलने लगता है। अदरक, काली मिर्च, पिप्पली, तुलसी, मुलेठी, लौंग, हल्दी, दालचीनी, शहद और गुनगुने जल का उपयोग कफ को पिघलाने में सहायक है। भोजन हल्का, गर्म, थोड़ा-सा मसालेदार और रुचिकर होना चाहिए। व्यायाम, प्राणायाम—विशेषतः भस्त्रिका और कपालभाति—कफ को ऊपर उठाकर बाहर निकाल देते हैं।

 

✍️जब शरीर गतिशील होता है, तो कफ के स्थिर गुण टूटते हैं। पसीना आना कफ को गलाने का सर्वोत्तम उपाय है। गुनगुने पानी से स्नान, भाप लेना, गरम सूप और खिचड़ी जैसे हल्के भोजन कफ की जकड़न कम करते हैं। रात में अधिक देर तक जागने पर कफ कम बनता है, परंतु इससे अग्नि कमजोर होती है। अतः संतुलन आवश्यक है।

 

✍️कफ तब तक बढ़ता है जब तक व्यक्ति जीवन को ठंडा, भारी और आरामप्रिय बनाए रखता है। इसे कम करने के लिए जीवन में हल्कापन, गति, सादगी और उष्णता लानी पड़ती है। जब शरीर और मन दोनों संतुलन में आते हैं, तब कफ अपनी प्राकृतिक भूमिका निभाता है—शरीर को स्थिरता, पोषण और शांति प्रदान करने की।

 

कफ श्वास नली में बनने वाला गाढ़ा बलगम है जो संक्रमण, जलन या पुरानी बीमारियों के कारण होता है। यह अक्सर खांसी और छाती में बेचैनी का कारण बनता है। कफ का रंग और गाढ़ापन उसके कारण पर निर्भर करता है, जैसे कि संक्रमण के लिए पीले/हरे रंग का, एलर्जी के लिए सफेद, या खून के लिए भूरे रंग का कफ हो सकता है।

 

कफ के कारण

 

संक्रमण: सामान्य सर्दी, फ्लू या अन्य श्वसन संक्रमण।

पुरानी बीमारियाँ: अस्थमा, सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज), या जीईआरडी (गैस्ट्रोइसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज)।

पर्यावरणीय कारक: धुएं या एलर्जी जैसे परेशानियों के संपर्क में आना।

अन्य: आयुर्वेद के अनुसार, कफ दोष के असंतुलित होने से भी मोटापा, सूजन और आलस बढ़ सकता है।

 

कफ से राहत के घरेलू उपाय

गर्म काढ़ा: तुलसी, काली मिर्च, गुड़ और अदरक का काढ़ा पीने से गले की खराश कम होती है और बलगम पतला होता है।

भाप लेना: पिप्पली के तेल या अन्य जड़ी-बूटियों की भाप लेने से सीने में जमा कफ से राहत मिल सकती है।

आयुर्वेदिक उपाय: घी और तेल का परहेज करें। पपीता, अनार, उबला हुआ सेब और अमरूद जैसे खाद्य पदार्थ शामिल करें।

अन्य: हल्दी वाला दूध, स्टीम और जल नेति जैसी प्रक्रियाएं भी फायदेमंद हो सकती हैं।

 

कफ को नियंत्रित करने के उपाय (आयुर्वेदिक दृष्टिकोण)

अनाज: बाजरा, मक्का, गेहूं और किनोवा जैसे अनाजों का सेवन करें।

सब्जियां: पालक, ब्रोकोली, गाजर और चुकंदर जैसी सब्जियां खाएं।

तेल: जैतून और सरसों के तेल का उपयोग करें।

अन्य: छाछ, पनीर और पुराने शहद का सेवन फायदेमंद हो सकता है।

वर्जित: नमक का सेवन कम करें।

 

कफ की स्थिति और संभावित कारण

पीला या हरा कफ: जीवाणु संक्रमण का संकेत हो सकता है।

सफेद कफ: वायरल संक्रमण या एलर्जी का संकेत हो सकता है।

भूरा या जंग जैसा कफ: बलगम में खून हो सकता है।

काला कफ: फंगल संक्रमण, न्यूमोकोनियोसिस, या अत्यधिक धुएं के संपर्क में आने से हो सकता है।

 

अमृता कुमारी – नेशन्स न्यूट्रीशन                             क्वालीफाईड डायटीशियन                                       डायबिटीज एजुकेटर, अहमदाबाद

By AMRITA

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