मेघालय के जैंतिया पहाड़ियों में बसे एक छोटे से गांव लाकाडोंग और यहां पर पाई जाने वाली खास हल्दी के बारे में बहुत कम लोग जानते थे। यहां की मिट्टी, मौसम और किसान सब मिलकर कुछ अनोखा उगा रहे थे।

जी7 समिट में देश और दुनिया ने इस लाकाडोंग हल्दी के बारे में जाना। अब लोग यह जानना चाहते हैं कि आखिर यह हल्दी इतनी खास क्यों है, जिसकी वजह से इसे अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली-

 

लाकाडोंग हल्दी की पहचान

 

लाकाडोंग हल्दी मेघालय की जैंतिया पहाड़ियों में उगाई जाने वाली एक विशेष किस्म है।

लाकाडोंग हल्दी वास्तव में हल्दी ही है, जो मेघालय के वेस्ट जयंतिया हिल्स क्षेत्र में उगाई जाती है। यह हल्दी देखने में आम हल्दी की तरह ही लगती है, लेकिन यह उससे कई गुना ज्यादा लाभकारी है।

 

लाकाडोंग हल्दी की खासियत

 

इस हल्दी को लेकर हर किसी के मन में यही सवाल है कि आखिर इसमें ऐसा क्या खास है। दरसअल, जहां आम हल्दी में करक्यूमिन की मात्रा 2-4 प्रतिशत होती है, वहीं लाकाडोंग में 7-12 प्रतिशत तक करक्यूमिन पाया जाता है। करक्यूमिन एक पॉलीफेनॉल है जिसमें एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। चूंकि इसमें करक्यूमिन आम हल्दी से 3 से 5 गुना ज्यादा होता है, इसलिए इसकी थोड़ी सी मात्रा भी स्वाद और गुणवत्ता के लिहाज से पर्याप्त होती है।

 

लाकाडोंग हल्दी सेहत के लिए वरदान

 

लाकाडोंग हल्दी (Lakadong turmeric benefits) को सेहत के लिए बहुत ही ज्यादा गुणकारी माना गया है, क्योंकि-

इम्यूनिटी, त्वचा और जोड़ों की सेहत के लिए लाकाडोंग हल्दी को लाभकारी माना जाता है।

लाकाडोंग हल्दी में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाने में मदद कर सकते हैं।

इसमें करक्यूमिन काफी अधिक होता है, जो जोड़ों और शरीर की सूजन को कम करने में बेहद ही सहायक है।

लाकाडोंग हल्दी स्किन की केयर में भी बेहद लाभकारी है।

♣  संतुलित मात्रा में इसे लेने से पाचन पर भी अच्छा असर पड़ता है।

लाकाडोंग हल्दी को मिल चुका है जीआई टैग

 

लाकाडोंग हल्दी को 30 मार्च 2024 को भारत सरकार के भौगोलिक संकेत पंजीयक (Geographical Indications Registry), चेन्नई द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया। जीआई टैग मिलने से लाकाडोंग हल्दी को वही मान्यता मिली है, जो दार्जिलिंग चाय, कश्मीरी केसर और बासमती चावल को मिली है। इससे लाकाडोंग हल्दी की गुणवत्ता काफी हद तक सुरक्षित हो गई है।

 

कुछ खास बातें

♦ अब सिर्फ मेघालय के जैंतिया हिल्स में उगी हल्दी ही लाकाडोंग कहलाएगी।

 

♦ इससे किसान अपनी असली पहचान के साथ अच्छी कीमत पा सकते हैं।

 

♦ स्थानीय किसानों के पारंपरिक ज्ञान को सरंक्षण मिलेगा।

 

♦ त्रिनिटी साइऊ के संघर्ष की कहानी है लाकाडोंग हल्दी

 

लाकाडोंग हल्दी की कहानी त्रिनिटी साइऊ के बिना अधूरी है। पश्चिम जैंतिया हिल्स के मूलीह गांव की रहने वाली त्रिनिटी साइऊ एक स्कूल टीचर और किसान है, जिन्होंने अपने इलाके की महिलाओं को जैविक खेती का महत्व सिखाया। उन्होंने रासायनिक उर्वरकों की जगह जैविक खाद इस्तेमाल करने पर जोर दिया। जहां हल्दी पहले जमीन पर उगाई जाती थी, वहीं उन्होंने ऊंची क्यारियों में हल्दी उगाई, जिससे उसमें बारिश में पानी जमा नहीं होता। उन्होंने हल्दी को धोने, काटने व सुखाने की सुविधाओं के लिए कम्युनिटी प्रोसेसिंग सेंटर बनाए। उनके प्रयासों से आज लगभग 14,000 किसान 43 गांवों में इस हल्दी को उगा रहे हैं।

By AMRITA

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