मिर्गी का दौरा दो मिनट से अधिक जारी रहने पर उसे जल्द रोकना जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक दौरा जारी रहने से गंभीर स्वास्थ्य खतरा पैदा होने का डर रहता है।

ऐसे में अब तक नाक के जरिये दी जाने वाली दवा मिडाजोलम को ही इसका असरदार उपाय माना जाता है। हालांकि, अब इसके विकल्प के तौर पर मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम इसके पीड़ितों विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों के लिए नई उम्मीद जगा रही है।

 

लंबे दौरों को करीब एक मिनट में रोक सकता है

क्लोबाजम सस्ती है और इसका उपयोग भी आसान। इसे केवल मुंह में रखना होता है। यह बात एम्स न्यूरोलाॅजी विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डाॅ. मंजरी त्रिपाठी के नेतृत्व में हुए शोध में सामने आई। शोध में दोनों दवाओं ने लंबे दौरों को करीब एक मिनट में रोक दिया। 95 मरीजों पर किए गए परीक्षण में क्लोबाजम, मिडाजोलम के समान प्रभावी विकल्प के तौर पर सामने आई।

 

570 दौरों में 52 बार दवा की जरूरत

एम्स के न्यूरोलाजी विभाग की एपिलेप्सी मानिटरिंग यूनिट में फरवरी 2021 से अगस्त 2022 के बीच यह अध्ययन किया गया। अध्ययन में दवा-प्रतिरोधी मिर्गी से पीड़ित 95 मरीजों को शामिल किया गया।

इनमें 47 मरीजों को नाक के जरिये मिडाजोलम और 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम दी गई। सभी मरीज पहले से क्लोबाजम सहित अन्य मिर्गी रोधी दवाएं ले रहे थे।

अध्ययन में कुल 570 दौरे दर्ज हुए, लेकिन दो मिनट से अधिक चलने वाले 52 दौरों में ही बचाव के लिए दवा देने की आवश्यकता पड़ी। इनमें 27 बार मिडाजोलम और 25 बार क्लोबाजम दी गई।

 

नहीं मिला महत्वपूर्ण अंतर

अध्ययन में क्लीनिकल तौर पर दौरा रुकने और ईईजी में दौरे की गतिविधि खत्म होने के समय की तुलना की गई। दोनों दवाओं के बीच किसी भी परिणाम में महत्वपूर्ण अंतर नहीं मिला। एम्स न्यूरोलाजी विभाग की प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डाॅ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम को देना आसान है।

इसे देने के लिए गोली को पीसने की भी आवश्यकता नहीं होती और यह उन मरीजों में उपयोगी हो सकती है, जिन्हें सामान्य गोली निगलने में कठिनाई होती है। नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम की तुलना में इसकी लागत कम होने से ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में इसकी उपलब्धता बेहतर होने की संभावना है।

 

बड़े अध्ययन से पुष्टि जरूरी

 

अध्ययन में मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम को लंबे दौरों को रोकने के लिए सुविधाजनक व किफायती विकल्प बताया गया है। पर, शोधकर्ताओं ने माना है कि मरीजों की संख्या कम थी। इसलिए अधिक मरीजों पर बड़े अध्ययन से इसकी प्रभावशीलता और सुरक्षा की पुष्टि जरूरी होगी।

By AMRITA

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