
भारत में बढ़ते मोटापे की समस्या अब केवल शहरों और महानगरों तक सीमित नहीं रही। खानपान की बदलती आदतों, पैकेट बंद और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की बढ़ती खपत तथा शारीरिक गतिविधियों में कमी के कारण गांवों में भी मोटापा तेजी से बढ़ रहा है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (एनएफएचएस-6) के अनुसार 15 से 49 वर्ष की 30.7 प्रतिशत महिलाएं और 27.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे की चपेट में हैं। पांच वर्ष पहले एनएफएचएस-5 में यह अनुपात महिलाओं में 24 प्रतिशत और पुरुषों में 22.9 प्रतिशत था।
गांवों में भी बढ़ा मोटापा
मोटापे को लेकर गांवों में भी स्थिति तेजी से बदल रही है। शहरी क्षेत्रों में 42.8 प्रतिशत महिलाएं और 36.3 प्रतिशत पुरुष मोटापे की चपेट में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 25.5 प्रतिशत महिलाएं और 23 प्रतिशत पुरुष इस समस्या से प्रभावित हैं।
गांवों में पैकेट बंद खाने पर खर्च 169 प्रतिशत बढ़ा
फेडरेशन आफ इंडियन चैंबर्स आफ कामर्स एंड इंडस्ट्री-कंज्यूमर एंड एडवोकेसी ग्रुप अगेंस्ट स्मगलिंग एंड काउंटरफीटिंग एक्टिविटीज डेस्क (एफआइसीसीआइ-कैस्केड) की नेशनल स्टैटिस्टिकल आफिस (एनएसएसओ) के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार 2011-12 से 2022-23 के बीच ग्रामीण भारत में पैकेट बंद खाद्य पदार्थों पर प्रति व्यक्ति मासिक खर्च 256.45 रुपये से बढ़कर 690.50 रुपये हो गया।
यानी इसमें 169 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी अवधि में शहरी क्षेत्रों में यह खर्च 407.41 रुपये से बढ़कर 1,022.94 रुपये हो गया।
150 प्रतिशत से अधिक बढ़ी बिक्री
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार भारत में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की बिक्री 2009 से 2023 के बीच 150 प्रतिशत से अधिक बढ़ी है।
घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2023-24 में भी पेय पदार्थ, रिफ्रेशमेंट और प्रोसेस्ड फूड पर ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति औसतन 406 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 776 रुपये मासिक खर्च दर्ज हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार भोजन की बदलती आदत के साथ शारीरिक गतिविधि में कमी बढ़ते वजन की समस्या को और गंभीर बना रही है।
पेट की चर्बी बड़ी चिंता
आइसीएमआर-इंडियाब के अध्ययन में 36 प्रतिशत वयस्कों में पेट पर अत्याधिक चर्बी पाई गई। बढ़ता वजन मधुमेह, उच्च रक्तचाप, फैटी लिवर और हृदय रोग जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ा रहा है। यही कारण है कि विशेषज्ञ मोटापे को गंभीर स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
बात ये है कि लोग यह जानते हैं कि अस्वास्थ्यकर भोजन नुकसान पहुंचा सकता है, फिर भी उसका सेवन करते हैं। इसलिए मोटापे को केवल जानकारी या जागरूकता की कमी से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।
व्यक्ति के व्यवहार पर जैविक और पर्यावरणीय दोनों प्रभाव पड़ते हैं। इन्हें समझे बिना मोटापे की समस्या का प्रभावी समाधान मुश्किल है।’
