
कई बार जब हम नींद में सो रहे होते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि हमारे आसपास कोई गतिविधि हो रही है, किसी खास तरह की आवाज सुनाई दे रही है। हम सब महसूस करते हैं, उठना चाहते हैं, आंखें खोलना चाहते हैं, कुछ बोलना चाहते हैं लेकिन, आवाज नहीं निकलती। सब महसूस होते हुए भी हमारा शरीर हमारे वश में नहीं होता , शक्तिहीन हो जाता है । क्या आपके साथ भी ऐसा होता है इस स्थिति को स्लीप पैरालिसिस बोलते हैं । आइए आज जानते हैं स्लीप पैरालिसिस होता क्या है और इससे बचें कैसे?
क्या होता है स्लीप पैरालिसिस ?
स्लीप पैरालिसिस ऐसी स्थिति है, जिसमें व्यक्ति सोते समय या नींद से जागते समय कुछ समय के लिए हिलने-डुलने या बोलने में असमर्थ हो जाता है। स्लीप पैरालिसिस को समझने के लिए आपको स्लीप पैटर्न को भी समझना होगा। हमारी नींद कई स्टेजेस से होकर गुजरती है। इनमें से एक महत्वपूर्ण चरण है आरईएम यानी रैपिड आई मूवमेंट स्लीप। इसी चरण में सपने अधिक स्पष्ट और जीवंत महसूस हो सकते हैं। रैपिड आई मूवमेंट स्टेज में नींद के दौरान शरीर की अधिकांश मांसपेशियों में अस्थायी रूप से बहुत कम गतिविधि होती है। यह एक सामान्य नेचुरल प्रक्रिया है, जिससे हम सपनों के दौरान अपने शरीर को उसी तरह हिलाने-डुलाने से बचते हैं जैसे सपना देख रहे होते हैं।समस्या तब महसूस होती है जब दिमाग नींद से जागने लगता है, लेकिन शरीर में रैपिड आई मूवमेंट स्लीप से जुड़ी मांसपेशियों की निष्क्रियता कुछ समय तक बनी रहती है। यानी दिमाग जागा हुआ महसूस करता है, लेकिन शरीर अभी पूरी तरह जागा नहीं होता है।कभी-कभी स्लीप पैरालिसिस का संबंध नार्कोलेप्सी नाम की नींद से जुड़ी बीमारी के साथ भी देखा गया है। बहुत से लोगों में स्लीप पैरालिसिस अलग से यानी आइसोलेटेड स्लीप पैरालिसिस के रूप में भी हो सकता है। कुछ लोगों में यह स्लीप पैरालिसिस बल्कि नींद से जुड़े भ्रम भी हो सकते हैं।
लक्षण जो महसूस हो सकते हैं
नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इन्फॉर्मेशन पर प्रकाशित शोध और मेडिकल रिव्यू के अनुसार, स्लीप डिप्राइवेशन यानी नींद की कमी और अनियमित स्लीप-वेक शेड्यूल स्लीप पैरालिसिस से जुड़े संभावित कारकों में शामिल हैं।एक बड़े इंटरनेशनल अध्ययन में 6,811 लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें स्लीप पैरालिसिस का अनुभव करने वाले लोगों में कम नींद की अवधि, सोने में अधिक समय लगना और इंसोमनिया के लक्षण अधिक पाए गए। स्लीप पैरालिसिस का लक्षण हर व्यक्ति में अलग महसूस सकता है। लेकिन जो सबसे ज्यादा लक्षण देखे गए हैं वो इस प्रकार हैं:
- कुछ लोगों को केवल शरीर हिलाने में परेशानी हो सकती है, जबकि कुछ लोगों को इसके साथ डरावने अनुभव भी हो सकते हैं।
- कुछ लोगों को महसूस हो सकता है कि वो पूरी तरह जाग चुके हैं, लेकिन शरीर नहीं हिल रहा।
- लोग बोलना चाहते हैं, लेकिन आवाज नहीं निकल पाती है।
- आंखें खोलना भी मुश्किल होना।
- कमरे में किसी व्यक्ति या किसी उपस्थिति का एहसास हो सकता है।
- छाती पर दबाव या भारीपन महसूस हो सकता है।
- बहुत ज्यादा डर या घबराहट महसूस हो सकती है।
स्लीप पैरालिसिस का कारण
स्लीप पैरालिसिस का कारण हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं पाया जाता है, लेकिन जो सबसे ज्यादा कारण देखे जाते हैं, वो इस प्रकार हैं:
सोने-जागने का समय फिक्स न होना
जिन लोगों का सोने और जागने का समय फिक्स नहीं होता, उनमें भी स्लीप पैरालिसिस की समस्या देखने को मिल सकती है। उदाहरण के लिए, अगर कोई व्यक्ति हर दिन अलग-अलग समय पर सोता या जागता है, जैसे कि किसी दिन 8 बजे सो जाना तो किसी दिन 11 बजे सोना, तो इससे स्लीप शेड्यूल अनियमित हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि लगातार बदलती हुई नींद की दिनचर्या शरीर की नेचुरल बॉडी क्लॉक और स्लीप साइकिल को प्रभावित कर सकती है, जिससे कुछ लोगों में स्लीप पैरालिसिस होने की संभावना बढ़ सकती है। आप सोने का समय फिक्स रखें, जैसे कि आपके सोने का समय 9 बजे है तो उसी समय पर या आसपास समय पर ही सोने की कोशिश करें।
तनाव रहना
लगातार तनाव, चिंता और कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों का संबंध स्लीप पैरालिसिस से पाया गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हर व्यक्ति जिसे तनाव है, उसे स्लीप पैरालिसिस जरूर होगा। अत्यधिक तनाव और खराब नींद एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं और कुछ लोगों में इस तरह की दिक्कतें बढ़ सकती है।
नींद पूरी न होना
अगर आप लगातार कम घंटे सो रहे हैं, देर रात तक जागते हैं या आपकी नींद बार-बार टूटती है, तो स्लीप पैरालिसिस की संभावना बढ़ सकती है। नींद की कमी और स्लीप पैरालिसिस के बीच संबंध कई अध्ययनों में देखा गया है।पर्याप्त और अच्छी क्वालिटी की नींद केवल शरीर को आराम देने के लिए जरूरी नहीं है, बल्कि यह दिमाग और शरीर के बीच सही तालमेल बनाए रखने में भी महत्वपूर्ण है। जब नींद का पैटर्न लगातार बिगड़ता है, तो इसका असर स्लीप साइकल पर पड़ सकता है।
नाइट शिफ्ट वर्कर
आज के समय में कई लोगों की नौकरी ऐसी है, जिसमें उन्हें दिन के बजाय रात में काम करना पड़ता है या हर कुछ दिनों में उनकी शिफ्ट बदलती रहती है। जो लोग रात में लेट नाइट तक काम करते हैं, जिनकी नाइट शिफ्ट होती है या जिनकी समय-समय पर शिफ्ट बदली रहती है, उनमें स्लीप पैरालिसिस का खतरा अधिक होता है। शिफ्ट बदलने से शरीर का नेचुरल स्लीप वेक रिदम भी प्रभावित हो सकता है।
स्लीप पैरालिसिस से बचने के लिए स्लीपिंग पैटर्न पर ध्यान दें
अगर आपको बार-बार स्लीप पैरालिसिस होता है, तो अपनी नींद की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है।सबसे पहले तो हर दिन अपने स्लीपिंग पैटर्न पर ध्यान दें। सामान्य तौर पर 7 से 9 घंटे की नियमित नींद की सलाह दी जाती है। इसके अलावा सोने और जागने का टाइम फिक्स रखें। रोज अलग-अलग समय पर सोने से स्लीप-वेक पैटर्न प्रभावित हो सकता है। इसी के साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि रात के समय सोने से पहले कैफीन और भारी भोजन से बचें।अगर आपको तनाव महसूस होता है तो आप मेडिटेशन करें ।अपनी स्लीपिंग पोजिशन का भी ध्यान रखें।पीठ के बजाय करवट लेकर सोने की कोशिश करें। अगर स्लीप पैरालिसिस कभी-कभार होता है और जल्दी खत्म हो जाता है, तो आमतौर पर यह गंभीर चिंता का विषय नहीं माना जाता। लेकिन अगर इसके एपिसोड बार-बार होने लगें, नींद को लेकर डर पैदा होने लगे या दिनभर अत्यधिक थकान और नींद महसूस हो, तो डॉक्टर से बात करना बेहतर है।
