
आजकल स्मार्टफोन की बढ़ती निर्भरता से याददाश्त, ध्यान लगाने की क्षमता और सोचने-समझने की शक्ति प्रभावित हो रही है। इस स्थिति को आमतौर पर ‘डिजिटल डिमेंशिया’ कहा जाता है।
स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप आज हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, काम, बैंकिंग, मनोरंजन और बातचीत तक के लिए लोग इन डिजिटल डिवाइस पर निर्भर हो गए हैं। लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है।
हालांकि डिजिटल डिमेंशिया कोई मेडिकल बीमारी नहीं है, बल्कि यह शब्द ज्यादा स्क्रीन टाइम और डिजिटल डिवाइस पर अत्यधिक निर्भरता के कारण दिमाग पर पड़ने वाले प्रभावों को समझाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। न्यूरोलॉजी विशेषज्ञों के अनुसार, जब इंसान छोटी-छोटी जानकारियों के लिए भी लगातार फोन पर निर्भर रहने लगता है तो उसकी प्राकृतिक याद रखने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर पड़ सकती है।
आज के समय में लोग फोन नंबर, रास्ते, जरूरी तारीखें और अपॉइंटमेंट तक याद रखने के बजाय हर चीज के लिए स्मार्टफोन का सहारा लेते हैं। इससे दिमाग की याददाश्त से जुड़ी प्रक्रिया कम सक्रिय हो सकती है। खासकर युवाओं और बच्चों में यह आदत तेजी से बढ़ रही है।
स्मार्टफोन के इस्तेमाल में सबसे बड़ी चुनौती सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और छोटे वीडियो कंटेंट हैं। रील्स और शॉर्ट वीडियो की लगातार स्क्रॉलिंग लोगों के ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को प्रभावित कर रही है। कुछ सेकंड के वीडियो देखने की आदत के कारण दिमाग लगातार नए और तेज मनोरंजन की तलाश करने लगता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, बार-बार नोटिफिकेशन चेक करना और बिना किसी उद्देश्य के घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करना यानी डूमस्क्रॉलिंग अटेंशन स्पैन को कम कर सकता है। इसका असर पढ़ाई, ऑफिस के काम और रोजमर्रा के फैसलों पर भी दिखाई देने लगा है। कई लोगों को लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान लगाने में परेशानी महसूस होने लगी है।
यह समस्या केवल युवाओं तक सीमित नहीं है। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के लोग ज्यादा स्क्रीन टाइम के प्रभाव से प्रभावित हो रहे हैं। बच्चों में जहां पढ़ाई और रचनात्मक सोच पर असर पड़ सकता है, वहीं वयस्कों में काम के दौरान एकाग्रता की कमी और मानसिक थकान जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।
स्मार्टफोन के ज्यादा इस्तेमाल का असर नींद पर भी पड़ रहा है। कई लोग रात में सोने से पहले लंबे समय तक सोशल मीडिया देखते रहते हैं। मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर की प्राकृतिक नींद प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इससे दिमाग को आराम मिलने में परेशानी होती है और नींद की गुणवत्ता खराब हो सकती है।
नींद पूरी नहीं होने से फोकस कम होता है, नई चीजें सीखने की क्षमता प्रभावित होती है और याददाश्त कमजोर हो सकती है। लंबे समय तक खराब नींद मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
हालांकि डिजिटल डिवाइस को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है, लेकिन इसके इस्तेमाल पर नियंत्रण जरूर रखा जा सकता है। सबसे जरूरी है कि स्क्रीन टाइम की सीमा तय की जाए और बिना जरूरत फोन देखने की आदत को कम किया जाए।
इसके अलावा रोजाना एक्सरसाइज, वॉकिंग, खुले वातावरण में समय बिताना और परिवार व दोस्तों के साथ बातचीत करना दिमाग को सक्रिय रखने में मदद कर सकता है। बच्चों के लिए भी जरूरी है कि उन्हें मोबाइल के साथ-साथ खेल, किताबों और रचनात्मक गतिविधियों की आदत डाली जाए।
तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाती है, लेकिन उसका संतुलित इस्तेमाल जरूरी है। स्मार्टफोन को सुविधा का साधन बनाए रखना चाहिए, न कि ऐसा उपकरण जो हमारी सोचने, याद रखने और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को कमजोर कर दे।
