
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 जारी किया है. सर्वे में देशभर के लगभग 6.79 लाख परिवारों और 715 जिलों को शामिल किया गया. सर्वे 2023-24 के दौरान किया गया और इससे भारत में स्वास्थ्य, पोषण, मातृ एवं शिशु देखभाल, टीकाकरण, परिवार नियोजन और महिलाओं की स्थिति से जुड़े अहम आंकड़े सामने आए हैं.
भारत ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, पोषण और स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है. सबसे बड़ा सुधार संस्थागत प्रसव में देखने को मिला. अब देश में 90.6 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों या स्वास्थ्य संस्थानों में हो रहे हैं, जबकि NFHS-5 में यह आंकड़ा 88.6 प्रतिशत था. इसका मतलब है कि अब अधिक महिलाएं सुरक्षित माहौल में बच्चे को जन्म दे रही हैं.
गर्भवती महिलाओं की देखभाल कवरेज भी बढ़ा है
केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार अब 95.9 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को ANC सेवाएं मिलीं, जबकि पहले यह 92.6 प्रतिशत था. गर्भावस्था की पहली तिमाही में जांच कराने वाली महिलाओं का प्रतिशत 70 प्रतिशत से बढ़कर 76.2 प्रतिशत हो गया. वहीं कम से कम चार बार जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या भी 58.5 प्रतिशत से बढ़कर 65.2 प्रतिशत पहुंच गई.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की मौजूदगी बढ़ी है. अब 91.3 प्रतिशत जन्म कुशल स्वास्थ्यकर्मियों की निगरानी में हो रही. नवजात शिशुओं को जन्म के दो दिन के भीतर मिलने वाली पोस्टनेटल केयर भी 79.1 प्रतिशत से बढ़कर 85.3 प्रतिशत हो गई है.
गर्भवती महिलाओं में पोषण सुधार के संकेत भी मिले हैं. 100 दिन या उससे अधिक समय तक आयरन-फोलिक एसिड की गोलियां लेने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44.1 से बढ़कर 54.9 हो गया. 180 दिन या उससे अधिक समय तक सप्लीमेंट लेने वाली महिलाओं की संख्या 26 प्रतिशत से बढ़कर 37.8 प्रतिशत पहुंच गई.
सरकार ने इन सुधारों का श्रेय जननी सुरक्षा योजना, जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम, प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान, सुमन योजना, प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना जैसी योजनाओं को दिया है.
परिवार नियोजन के क्षेत्र में भी प्रगति दर्ज की गई है
भारत की कुल प्रजनन दर यानी TFR 2.0 पर स्थिर बनी हुई है. गर्भनिरोधक उपयोग दर यानी CPR 66.7 प्रतिशत से बढ़कर 69.1 प्रतिशत हो गई है. इससे पता चलता है कि परिवार नियोजन सेवाओं की पहुंच बेहतर हुई है.
बच्चों के टीकाकरण में भी बड़ा सुधार हुआ है
12 से 23 महीने के बच्चों में पूर्ण टीकाकरण कवरेज 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है. 95.6 प्रतिशत बच्चों को ज्यादातर टीके सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के जरिए लगाए गए, जिससे सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का भरोसा मजबूत होने का संकेत मिलता है.
रोटावायरस वैक्सीन कवरेज में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज हुई
यह 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 85.4 प्रतिशत हो गई. खसरा वैक्सीन की दूसरी डोज का कवरेज भी 58.6 प्रतिशत से बढ़कर 71.8 प्रतिशत पहुंच गया.
तीव्र श्वसन संक्रमण के लक्षण वाले बच्चों का प्रतिशत 2.8 से घटकर 1.9 हो गया. गंभीर डायरिया के मामलों में भी गिरावट आई है. बच्चों के पोषण की स्थिति में भी सुधार देखने को मिला. पांच साल से कम उम्र के बच्चों में स्टंटिंग यानी उम्र के हिसाब से कम लंबाई की समस्या 35.5 प्रतिशत से घटकर 29.3 प्रतिशत हो गई. यह लगभग 17 प्रतिशत की कमी है.
गंभीर कुपोषण में 32 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई. यह आंकड़ा 7.7 प्रतिशत से घटकर 5.2 प्रतिशत रह गया. अंडरवेट बच्चों की संख्या में भी हल्की गिरावट दर्ज हुई है.
छह महीने तक केवल स्तनपान कराने की दर 95.6 प्रतिशत रही. जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान शुरू कराने का प्रतिशत भी 41.8 से बढ़कर 50.1 प्रतिशत हो गया. सरकार का मानना है कि इन सुधारों के पीछे श्रेय पोषण अभियान, सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0, ICDS और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन जैसी योजना है.
स्वास्थ्य बीमा और वित्तीय सुरक्षा के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला
स्वास्थ्य बीमा या सरकारी स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं से जुड़े परिवारों का प्रतिशत 41 प्रतिशत से बढ़कर 60.2 प्रतिशत हुआ है. इसमें आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की अहम भूमिका बताई गई है.
महिलाओं की आर्थिक और डिजिटल भागीदारी भी बढ़ी है
इंटरनेट इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का प्रतिशत लगभग दोगुना होकर 33.3 प्रतिशत से 64.3 प्रतिशत हो गया. खुद इस्तेमाल करने वाला बैंक खाता रखने वाली महिलाओं की संख्या 78.6 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत पहुंच गई. मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 53.9 से बढ़कर 63.6 हो गया. 15 से 24 वर्ष की महिलाओं में सुरक्षित मासिक धर्म स्वच्छता उत्पादों के उपयोग में भी वृद्धि दर्ज हुई है. यह आंकड़ा 77.6 प्रतिशत से बढ़कर 79.2 प्रतिशत हो गया.
देश के सामने अब गैर-संचारी रोगों, मोटापा, खराब जीवनशैली और दोहरे पोषण संकट जैसी नई चुनौतियां उभर रही हैं. इसलिए भविष्य में संतुलित पोषण, स्वस्थ जीवनशैली और रोकथाम आधारित स्वास्थ्य सेवाओं पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होगी.
