क्या आप जानते हैं कि आपके पीने के पानी में प्लास्टिक के कण (Microplastics) भी घुले हो सकते हैं, जो कैंसर और दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं? ऐसे में इन्हें हटाना लोगों के लिए बहुत महंगा और मुश्किल काम होता है. लेकिन साओ पाउलो स्टेट यूनिवर्सिटी के विज्ञान और टेक्नोलॉजी संस्थान (आईसीटी-यूएनईएसपी) के वैज्ञानिकों ने अब इसका बेहद सस्ता और कारगर तरीका खोज लिया है. यह आपकी रसोई या बगीचे में ही मिल जाता है. एक नए रिसर्च में खुलासा हुआ है कि मोरिंगा ओलिफेरा जैसे साधारण पौधों का उपयोग करके पानी से माइक्रोप्लास्टिक को पूरी तरह साफ किया जा सकता है. यह आपके पीने के पानी से माइक्रोप्लास्टिक्स को 90% तक सोख सकता है. आइए जानते हैं कि इस ‘प्लांट-बेस्ड’ वाटर फिल्टर के पीछे का विज्ञान क्या है.

 

क्या है माइक्रोप्लास्टिक का खतरा?

 

माइक्रोप्लास्टिक ऐसे छोटे प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार 5 मिलीमीटर से भी कम होता है. ये प्लास्टिक बोतलों, कपड़ों, कचरे और इंडस्ट्रियल एरिया में होने वाली गतिविधियों से निकलकर पानी तक पहुंच जाते हैं. ये कण सिर्फ पानी में ही नहीं, बल्कि खाने और यहां तक कि इंसानी शरीर में भी पाए जा चुके हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि ये जहरीले केमिकल्स को साथ लेकर चलते हैं, जो सेहत के लिए लंबे समय में नुकसानदायक हो सकते हैं.

 

हर जगह दिखने वाला पौधा बना वैज्ञानिकों का हीरो

 

नई रिसर्च में जिस पौधे की चर्चा हो रही है, वह कोई दुर्लभ जड़ी-बूटी नहीं, बल्कि आमतौर पर भारत में मिलने वाला सहजन यानी मोरिंगा है. वैज्ञानिकों ने पाया कि इसके बीजों से निकला खास घोल पानी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को हटाने में मदद करता है. यह खोज ब्राजील के वैज्ञानिकों ने की है और इसे एक बड़ी सफलता माना जा रहा है.

 

कैसे काम करता है मोरिंगा का बीज

 

इस पौधे के बीजों में प्राकृतिक प्रोटीन होते हैं, जिनमें पॉजिटिव चार्ज होता है. जब इन्हें पानी में मिलाया जाता है, तो ये माइक्रोप्लास्टिक कणों (जो नेगेटिव चार्ज वाले होते हैं) से चिपक जाते हैं. इसके बाद ये छोटे-छोटे कण आपस में जुड़कर बड़े गुच्छों में बदल जाते हैं, जिन्हें आसानी से फिल्टर किया जा सकता है. सीधी भाषा में कहें तो यह पौधा पानी में छिपे प्लास्टिक को पकड़कर बाहर निकालने में मदद करता है.

 

केमिकल से भी बेहतर निकला यह तरीका

 

अब तक पानी को साफ करने के लिए एल्युमिनियम सल्फेट जैसे केमिकल्स का इस्तेमाल होता रहा है. लेकिन इस रिसर्च में पाया गया कि मोरिंगा का नेचुरल घोल कई मामलों में इन केमिकल्स जितना ही असरदार या उनसे बेहतर साबित हुआ. कुछ परीक्षणों में यह तरीका 90% से ज्यादा माइक्रोप्लास्टिक हटाने में सफल रहा, जिससे वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं.

 

कम खर्च में बड़ा समाधान

 

इस रिसर्च की सबसे बड़ी खासियत इसकी सादगी और सस्ती तकनीक है. जहां आधुनिक वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना महंगा होता है, वहीं मोरिंगा जैसे पौधे हर जगह आसानी से उगाए जा सकते हैं. ऐसे में यह तकनीक गांवों और कम संसाधन वाले इलाकों के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकती है.

 

दुनिया भर में बढ़ती चिंता के बीच राहत की खबर

 

माइक्रोप्लास्टिक आज पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुका है. यह अब नदियों, झीलों, समुद्रों और यहां तक कि पीने के पानी तक में पहुंच चुका है. वैज्ञानिक लगातार ऐसे उपाय खोज रहे हैं, जो इसे सस्ते और सुरक्षित तरीके से हटाने में मदद करें. मोरिंगा पर हुई यह रिसर्च उसी दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है. हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले और परीक्षण की जरूरत है. फिर भी शुरुआती नतीजे काफी सकारात्मक हैं और यह दिखाते हैं कि प्रकृति में ही कई समस्याओं का हल छिपा हुआ है.

 

भारत के लिए बेहद खास है यह खोज

 

भारत में मोरिंगा यानी सहजन का पेड़ पहले से ही बड़े पैमाने पर पाया जाता है. इसे खाने और औषधीय गुणों के लिए जाना जाता है. अब अगर यह पानी को साफ करने में भी काम आता है, तो यह देश के लिए बेहद खास पौधा बन सकता है. खासकर उन इलाकों में, जहां साफ पानी की कमी है. यह पौधा पानी में बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक संकट के बीच उम्मीद की एक किरण जैसा है.

By AMRITA

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