
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026 के दौरान हेल्थकेयर और लाइफ साइंसेज क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। सरकार ने ‘बायोफार्मा शक्ति’ नामक एक नई पहल की शुरुआत की है, जिसके लिए अगले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया जाएगा।
इसका मुख्य उद्देश्य भारत को एक आत्मनिर्भर और मजबूत बायोफार्मा केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
बायोफार्मा शक्ति का महत्व
यह पहल बायोलॉजिकल दवाओं के अनुसंधान, नवाचार और निर्माण पर केंद्रित है। इसे देश में तेजी से बढ़ रही गैर-संक्रामक बीमारियों को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है। सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में डायबिटीज, कैंसर और ऑटोइम्यून बीमारियों का स्वास्थ्य प्रणाली पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
गैर-संक्रामक बीमारियों का बढ़ता खतरा
भारत में बीमारियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। पहले संक्रामक रोगों का खतरा था, लेकिन अब गैर-संक्रामक बीमारियों ने उनकी जगह ले ली है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, देश में होने वाली कुल मौतों में से लगभग 60 प्रतिशत गैर-संक्रामक रोगों के कारण होती हैं, जिनमें हृदय रोग, डायबिटीज, कैंसर और श्वसन संबंधी पुरानी बीमारियां शामिल हैं।
गैर-संक्रामक बीमारियां केवल स्वास्थ्य से संबंधित समस्या नहीं हैं, बल्कि ये देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन बीमारियों के कारण भारत को हर साल उत्पादकता में भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
डायबिटीज की बढ़ती समस्या
डायबिटीज के मामलों में भारत विश्व में अग्रणी है। आंकड़ों के अनुसार, करोड़ों भारतीय इस बीमारी से प्रभावित हैं, और भविष्य में यह संख्या और बढ़ने की संभावना है। समस्या केवल मरीजों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़ी आबादी में समय पर डायबिटीज का पता नहीं चल पाता।
ऑटोइम्यून बीमारियों की पहचान भारत में लंबे समय तक कम रही है, लेकिन हाल के वर्षों में इन मामलों में वृद्धि देखी गई है। रुमेटाइड आर्थराइटिस, ल्यूपस और टाइप वन डायबिटीज जैसी बीमारियां विशेष रूप से महिलाओं में तेजी से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सही डेटा और राष्ट्रीय स्तर की रजिस्ट्री की कमी के कारण इन बीमारियों का वास्तविक बोझ अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हुआ है।
