मानसून के दौरान वातावरण में कई परिवर्तन होते हैं जो कि हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। इस मौसम में सबसे ज्यादा परेशानी त्वचा संबंधित रोगों की होती है। बारिश में डिगने की वजह से या फिर उस वाली गर्मी और चिपचिपे पसीने की वजह से त्वचा पर बहुत हीं प्रतिकूल असर पड़ता है। घमौरियाँ, फोड़े-फुंसी, कील, त्वचा का जलना, बरसाती घाव वगैरह – वगैरह बहुत ही आम समस्या बन जाते हैं। आइए जानते हैं इसकी असली वजह और आयुर्वेदिक उपचार के बारे में।

 

फोड़े होने के लक्षण

जब शरीर के किसी हिस्से में मवाद या पस जमा हो जाता है, तो इसे एब्सेस या फोड़ा कहा जाता है। यह समस्या शरीर के किसी भी भाग में उत्पन्न हो सकती है, जिससे त्वचा उभर जाती है और उसमें मवाद भर जाता है, जिसे छूने पर दर्द का अनुभव होता है.

 

फोड़े-फुंसियों के कारण

 

फोड़े और फुंसियों के बनने के पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे बैक्टीरियल संक्रमण, खाद्य एलर्जी, लिम्फ नलिकाओं में रुकावट, त्वचा की उचित सफाई न करना, शरीर में टॉक्सिन का जमा होना, और गर्म चीजों का अधिक सेवन करना.

आयुर्वेद में इनसे छुटकारा पाने के लिए कई प्रभावी उपाय बताए गए हैं, जिनमें नीम की छाल का उपयोग विशेष रूप से उल्लेखनीय है.

 

नीम की छाल का उपयोग

 

नीम का पेड़ अनेक गंभीर बीमारियों के उपचार में सहायक होता है और इसके कई औषधीय गुण होते हैं. फोड़े या फुंसी होने पर उन्हें हाथ से न छेड़ें, क्योंकि इससे बैक्टीरिया अन्य हिस्सों में फैल सकते हैं और गंभीर समस्याएं उत्पन्न कर सकते हैं.

 

नीम की छाल को लगाने का तरीका

 

नीम की छाल को पत्थर पर घिसकर उसमें थोड़ा पानी मिलाएं और इसे फोड़े-फुंसी पर लगाकर सूखने दें. यह उपाय फोड़े-फुंसियों को जल्दी ठीक करने में मदद करता है. नीम की छाल में एंटीबैक्टीरियल, एंटीफंगल, एंटीऑक्सीडेंट, एंटीसेप्टिक और एंटीवायरल गुण होते हैं, जो त्वचा पर मौजूद फोड़े-फुंसियों को समाप्त करते हैं और संक्रमण के फैलाव को रोकते हैं.

By AMRITA

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