
हाल ही में खुलासा हुआ है कि इंसानों की बॉडी, खासकर उनके फेंफड़ों में एक खास फंगस ग्रो कर रहा है. ये कोई साधारण बीमारी नहीं बल्कि एक खतरनाक फंगस इनफेक्शन है जिसका नाम है एस्परगिलोसिस.
वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में तीन मुख्य प्रजातियों पर फोकस किया गया है- एस्परगिलस फ्यूमिगेटस, एस्परगिलस फ्लेवस और एस्परगिलस नाइजर. ये फंगस हवा में सूक्ष्म स्पोर्स छोड़ते हैं जो हम रोज बिना जाने सांस के साथ अंदर ले लेते हैं. स्वस्थ इंसान के इम्यून सिस्टम इन स्पोर्स को आसानी से साफ कर देता है लेकिन जिन लोगों का इम्यून सिस्टम कमजोर है उनके लिए ये जानलेवा बन सकता है.
कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग कौन हैं?
कैंसर का इलाज करा रहे मरीज, ऑर्गन ट्रांसप्लांट वाले, एचआईवी या पुरानी फेफड़ों की बीमारी जैसे सीओपीडी, अस्थमा वाले लोग इसका शिकार बन रहे हैं. इनमें फंगस के स्पोर्स फेफड़ों में जाकर बढ़ने लगते हैं. फंगस फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान पहुंचाता है और गंभीर मामलों में खून की नलिकाओं में घुसकर पूरे शरीर में फैल जाता है. इसे इनवेसिव एस्परगिलोसिस कहते हैं. इसकी इलाज दर कम है और मौत का खतरा 40 से 90 प्रतिशत तक हो सकता है भले ही दवा दी जाए.
तेजी से फ़ैल रहा फंगस
नई रिसर्च में जलवायु परिवर्तन का भी जिक्र है. हाई एमिशन वाले परिदृश्य में एस्परगिलस फ्यूमिगेटस यूरोप के कई हिस्सों में अपना क्षेत्र बढ़ा सकता है. गर्म होती हवा और बदलते मौसम से ये फंगस ज्यादा जगहों फ़ैल रहा है. पहले जहां ये ठंडे इलाकों में कम था अब वहां भी बढ़ रहा है. भारत जैसे देशों में भी गर्मी और प्रदूषण बढ़ने से फेफड़ों की बीमारियां बढ़ रही हैं और फंगस का खतरा भी बढ़ता जा रहा है.
फंगस कैसे काम करता है?
इसके स्पोर्स हवा में तैरते रहते हैं. स्वस्थ व्यक्ति सांस लेते समय इन्हें अंदर ले लेता है लेकिन इम्यून सिस्टम सफेद रक्त कोशिकाओं से इन्हें नष्ट कर देता है. लेकिन कमजोर इम्यूनिटी में स्पोर्स अंकुरित होकर हाइफे बनाते हैं. ये हाइफे फेफड़ों की दीवारों को तोड़कर अंदर घुस जाते हैं. मरीज को बुखार, खांसी, सांस फूलना, सीने में दर्द और खून वाली खांसी होती है. कई बार इसे टीबी या निमोनिया समझ लिया जाता है और गलत इलाज होता है. वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में कोविड महामारी के बाद ऐसे मामलों में तेजी आई है. कोविड से ठीक होने वाले मरीजों में फेफड़ों की क्षति के कारण फंगस आसानी से घुस जाता है. ग्लोबल वार्मिंग से फंगस की संख्या बढ़ रही है. अध्ययनों में पाया गया कि उच्च उत्सर्जन वाले क्षेत्रों में 2050 तक एस्परगिलोसिस के मामले दोगुने हो सकते हैं.
भारत में भी पसार रहा पैर
भारत में भी चिंता बढ़ रही है. दिल्ली, मुंबई जैसे प्रदूषित शहरों में फेफड़ों की बीमारियां पहले से ज्यादा हैं. डॉक्टर्स कह रहे हैं कि अगर इम्यूनिटी कमजोर है तो मोल्ड वाले पुराने घरों या नम जगहों से बचें. बगीचों में काम करते समय मास्क लगाएं क्योंकि मिट्टी और पत्तों में ये फंगस पाया जाता है. बात इसकी इलाज की करें तो एंटीफंगल दवाएं जैसे वोरिकोनाजोल, एम्फोटेरिसिन बी इस्तेमाल होती हैं लेकिन ये महंगी हैं और साइड इफेक्ट्स भी हैं. गंभीर मामलों में सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है. वैज्ञानिक अब नए ड्रग्स और वैक्सीन पर रिसर्च कर रहे हैं. लेकिन सबसे जरूरी है रोकथाम. ये फंगस देखने में खूबसूरत लगता है. माइक्रोस्कोप में नीले-हरे रंग के हाइफे और गोल स्पोर्स जैसे फूल दिखते हैं लेकिन अंदर से ये शरीर को खा जाता है. लोग सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें देखकर हैरान रह जाते हैं कि इतना सुंदर दिखने वाला जीव कितना खतरनाक है.
