
मानव शरीर का निर्माण कुछ इस कदर है कि यह घटते बढ़ते तापमान के साथ खुद को संतुलित कर लेता है। सर्दियों के मौसम में शरीर अपने आप को गर्म रखने के लिए अपने शरीर के अंदर और बाहर के टेंपरेचर को भी संतुलित करता है ठीक वैसे ही गर्मी के मौसम में भी पसीना बहा कर वह बाहर की गर्मी को अंदर जाने से रोकता है और अंदर की गर्मी को पसीने के वाष्प के द्वारा संतुलित कर ठंडा रखता है। बारिश के मौसम में भी कुछ ऐसे ही तकनीक से शरीर का तापमान संतुलित रहता है आईए जानते हैं कि किस तापमान तक हमारा शरीर खुद को संतुलित रख सकता है।
वेट बल्क तापमान का असर
हमारा शरीर सिर्फ बाहरी तापमान से प्रभावित नहीं होता है, बल्कि हवा में मौजूद नमी के मेल पर भी प्रतिक्रिया देता है, इसे वेट बल्क टेंपरेचर कहते हैं. पहले यह माना जाता था कि इंसान अधिकतम 35 डिग्री सेल्सियस वेट बल्ब तापमान तक सुरक्षित रह सकता है. हालांकि पेंसिल्वेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी की नई स्टडी ने इस दावे को चुनौती दे है. नए रिसर्च के अनुसार, शरीर की सहनशीलता की वास्तविक सीमा लगभग 30 डिग्री से 31 डिग्री सेल्सियस के बीच है. इस स्तर के पार पहुंचते ही शरीर अपनी प्राकृतिक कूलिंग प्रणाली को प्रभावी तरीके से बनाए नहीं रख पाता, जिससे हेल्थ पर बड़ा असर पड़ सकता है.
नमी क्यों बढ़ा देती है गर्मी का खतरा
गर्मी का असर सिर्फ तापमान पर ही नहीं निर्भर करता है, बल्कि हवा में मौजूद नमी भी इसे और भी ज्यादा खतरनाक बनाती है. सूखी गर्मी में शरीर से निकलने वाला पसीना जल्दी वाष्प बनकर उड़ जाता है, जिससे शरीर को ठंडक मिलती है. लेकिन जब हवा में नमी की मात्रा ज्यादा हो जाती है, तो पसीना आसानी से सूख नहीं पाता और शरीर की कूलिंग कमजोर होने लगती है. ऐसे में भले ही पारा बहुत ज्यादा न हो, लेकिन शरीर तेजी से गर्म होने लगता है. यही कारण है कि नमी भरी गर्मी, 45 डिग्री सेल्सियस या उससे ज्यादा की सूखी गर्मी से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकती है, क्योंकि शरीर खुद को प्रभावी तरीके से ठंडा नहीं कर पाता.
शरीर को कब होता है गर्मी से खतरा?
विज्ञान के मुताबिक, इंसान ज्यादा से ज्यादा तापमान 42.3 डिग्री सेल्सियस में आसानी से सह सकता है, इससे ज्यादा टेंपरेचर होने पर परेशानी बढ़ने लगती है. लेकिन जब शरीर का टेंपरेचर 40 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाता है तो हीट स्ट्रीक का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है. इससे शरीर का कूलिंग सिस्टम काम नहीं कर पाता है, जिससे चक्कर आना, ठीक से दिखाई न देना और बेहोशी जैसी समस्या होने लगती है. वहीं अगर समय पर सही इलाज न मिले तो कुछ ही घंटे में जान भी जा सकती है.
सिर्फ आप पर ही नहीं होता असर
काफी ज्यादा गर्मी सिर्फ आपको अहसज ही नहीं बनाती आपके जरूरी अंगों पर भी असर डालती है. दिमाग में सूजन आ सकती है जिससे भ्रम या फिर दौरे पड़ सकते हैं. दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इससे दिल पर दबाव बढ़ने का खतरा बढ़ जाता है.
जरूरी अंगों पर पड़ता है सीधा असर
भयंकर गर्मी सिर्फ आपको परेशान ही नहीं करती, बल्कि शरीर के जरूरी अंगों को भी प्रभावित करती है. ज्यादा तापमान के कारण दिमाग पर असर पड़ सकता है, जिससे सूजन, भ्रम या दौरे जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. वहीं शरीर का टेंपरेचर कंट्रोल में रखने के लिए दिल को सामान्य से ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है. इससे दिल पर ज्यादा प्रेशर बढ़ जाता है और गंभीर बीमारी होने की आशंका बढ़ सकती है.
