पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस प्रसव के बाद यानी शिशु के जन्म के बाद महिला को होने वाली समस्या है। यह थायरॉइड ग्लैंड की सूजन से संबंधित समस्या है। की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस गर्भावस्था के पहले वर्ष के भीतर लगभग 5-10 महिलाओं को प्रभावित करता है।

हालांकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के मामले कम देखने को मिलते हैं। इसके बावजूद यह जरूरी है कि हर किसी को इस बीमारी के बारे में पता हो।

 

क्या है पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस ?

 

बच्चे को जन्म देने के बाद महिला के थायरॉइड ग्लैंड में आई सूजन को हम पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के नाम से जानते हैं। इसे तीन चरणों में विभाजित किया जाता है। इसके विभिन्न चरणों को समझने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि थायरॉइड क्या है? थायरॉइड तितली के आकार का छोटा सा ग्लैंड है, जो गर्दन के सामने के निचले हिस्से में स्थित है। यह हार्मोन रिलीज करता है, जिसकी वजह से हमारा शरीर सुचारू ढंग से काम करने में सक्षम होता है। जब इसमें दिक्कत आ जाती है तो सभी तरह से हार्मोन रिलीज नहीं हो पाते हैं और शरीर के कई फंक्शन प्रभावित होने लगता हैं। बहरहाल, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एक ऑटोइम्यून कंडीशन है। जो डिलीवरी के बाद पहले साल में महिलाओं को प्रभावित करती है। पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस साइलेंट समस्या है और 50% महिलाओं में यह बिना किसी गंभीर लक्षण के होकर गुजर जाती है, लेकिन भविष्य में उन्हें स्थायी हाइपोथायरायडिज्म का खतरा बना रहता है।

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के तीन चरण

 

♦ चरण-1ः इस चरण को हाइपरथायरायडिज्म कहा जा सकता है। इसमें थायरॉइड ग्लैंड में सूजन के कारण हार्मोन स्राव बढ़ जाता है। यह स्थिति आमतौर पर डिलीवरीके एक से छह महीने के अंदर होने लगती है। विशेषज्ञों की मानें, तो यह कंडीशन एक सप्ताह से तीन महीनों तक बनी रह सकती है।

♦ चरण-2ः इसे हम हाइपोथायरायडिज्म के नाम से जानते हैं। इस चरण में प्रसव के बाद महिलाओं का थायरॉइड ग्लैंड बहुत कम मात्रा में हार्मोन रिलीज करता है। अमूमन इस तरह की स्थिति डिलीवरी के चार से आठ महीने बाद शुरू होती है और यह साल भर के लिए बनी रह सकती है।

♦ चरण-3ः पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का तीसरा चरण एक तरह से सामान्य होता है। इसका मतलब है कि थायरॉइड ग्लैंड एक बार फिर सामान्य हार्मोन रिलीज कर देता है।

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के कारण

 

के अनुसार, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस ऑटोइम्यून इंफ्लेमेशन के कारण होने वाली समस्या है। जैसा कि पहले भी बताया गया है कि यह बीमारी प्रसव के बाद इम्यून सिस्टम के फिर से एक्टिव होने के कारण शुरू होती है। हालांकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने के पीछे कई अन्य कारण भी जिम्मेदार हैं, जैसे-

 

ऑटोइम्यून रिबाउंडः “प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर के ज्यादातर अंगों पर दबाव बनने लगता है। इसी वजह से महिलाओं को कई तरह की शारीरिक समस्याएं होने लगती हैं। इसी तरह, गर्भावस्था में भ्रूण को सपोर्ट करने के लिए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली भी दब जाती है। वहीं, डिलीवरी के बाद यह सामान्य स्थिति में लौट आती है, जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली रिबाउंड हो जाती है यानी तेजी से सक्रिय हो जाती है। नतीजतन, थायरॉइड ग्लैंड सही तरह से काम नहीं कर पाता है। ऐसे में हाइपरथायरॉइडिज्म और हाइपोथायरायडिज्म जैसी कंडीशन पैदा हो जाती है।”

एंटी-थायरॉयड एंटीबॉडीज का पहले से मौजूद होनाः  गर्भावस्था से पहले या शुरुआती दौर में एंटी-थायरॉयड एंटीबॉडीज की मौजूदगी भी इस बीमारी का एक संकेत है।

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लक्षण

 

चूंकि, पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस थायरॉइड ग्लैंड में आई अस्थायी सूजन है। आमतौर पर यह समस्या 1-6 माह बाद भी हो सकती है। इसलिए, इसके हर चरण में कुछ एक जैसे और कुछ बिलकुल अलग नजर आ आते हैं।

 

हाइपरथायरॉइड फेज (शुरुआती 1 से 4 महीने में)

 

एंग्जाइटी, चिड़चिड़ापन और नर्वसनेस होना

हार्ट रेट तेज होना

अचानक वजन घटना

बहुत ज्यादा गर्मी लगना और पसीना आना

हाथ-पांव में कंपकंपी छूटना

नींद न आना या इंसोम्निया

 

हाइपोथायरॉइड फेज (पोस्ट डिलीवरी 4 से 8 महीने में)

 

थकान और कमजोरी महसूस करना

एनर्जी का स्तर कम होना

वजन बढ़ना

कब्ज होना

ठंड बहुत ज्यादा लगना

त्वचा ड्राई होना

बालों का झड़ना

मसल्स में दर्द होना

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का शरीर पर असर

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एक ऐसी कंडीशन है, जो 12-18 महीनों में अपने आप ठीक हो जाती है। इसके बावजूद, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह समस्या महिलाओं के शरीर को कई तरह से प्रभावित सकती है, जैसे-

 

मानसिक स्वास्थ्य पर असरः

आमतौर पर पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर हम शारीरिक स्वास्थ्य की बात अधिक करते हैं, जबकि यह महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस एंग्जाइटी, डिप्रेशन और बहुत ज्यादा थकान जैसी चीजों से भी संबंध रखता है। ज्यादातर महिलाएं इस स्थिति को पोस्टपार्टम फटीग से जोड़कर देखती हैं। ऐसे में उनका ट्रीटमेंट भी देरी से शुरू होता है। यह कंडीशन सही नहीं है।

 

शारीरिक स्वास्थ्य पर असरः

यह सच है कि हमें पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर मानसिक स्वास्थ्य पर भी बात करनी चाहिए, लेकिन शारीरिक स्वास्थ्य पर असर गहरा असर पड़ता है। विशेषज्ञों की मानें, तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस होने पर महिलाओं को शुरुआती दिनों में हाइपरथायरॉइडिज्म या थायरोटॉक्सिक फेज (शरीर में थायरॉइड हार्मोन (T3/T4) की अधिकता से होने वाली स्थिति है, जिससे मेटाबॉलिज्म तेज हो जाता है) में वजन कम होना, हार्ट रेट बढ़ना, हाथ कांपना, घबराहट और गर्मी बर्दाश्त न कर पाना जैसे लक्षण दिखते हैं। जैसी परेशानियां होने लगती हैं।

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का निदान

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के निदान के लिए डॉक्टर सबसे पहले शरीर में नजर आ रहे लक्षणों पर बात करते हैं। अगर लक्षण पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस से मिलते-जुलते हों, तो ब्लड में थायरॉइड हार्मोन (T3, T4 या TSH) के स्तर की जांच करने के लिए ब्लड टेस्ट की सलाह दी जाती है। आमतौर पर पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का पता लगाने के लिए ब्लड टेस्ट पर्याप्त होता है। हां, कई बार पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के लक्षण किसी अन्य बीमारी से मिलते-जुलते हो सकते हैं।

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इलाज

 

पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का ट्रीटमेंट इसके विभिन्न चरणों पर आधारित होता है। इसके तहत अनियमित हार्ट बीट को संतुलित करने की कोशिश की जाती है और कई बार हार्मोन रिप्लेसमेंट की भी मदद ली जाती है।

 

सलाह :

यूं तो पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस जैसी समस्याएं दुर्लभ मामलों में देखने को मिलती हैं। फिर भी हमें किसी भी बीमारी के प्रति लापरवाही नहीं करनी चाहिए और न ही शरीर में नजर आ रहे लक्षणों को इग्नोर करना चाहिए। ऐसा ही पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस के साथ भी है। अगर किसी महिला को पोस्टपार्टम थायरॉइडाइटिस का इतिहास रहा है या परिवार में इसकी हिस्ट्री रही है, तो उन्हें और भी सावधानी बरतनी चाहिए और जरूरत अनुसार डॉक्टर के पास नियमित रूप से जांच करवाने के लिए जाना चाहिए।

By AMRITA

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